गुरुवार, 27 नवंबर 2014

खोज रहा मेरा बचपन

खोज रहा मेरा बचपन

सिर पर उठाये ईंटों का बोझ 
मैं खोज रहा ,मेरा बचपन 
पिता मेरे नशे में धुत,
कर रहे व्यतीत अपना जीवन । 
माँ फटी -सी साड़ी में लिपटी ,
खाँस -खाँस ,फूंक रही ईंधन । 
खाली  है चूल्हे के बगल में,
आटे -दाल व  चावल का बर्तन । 
सिर पर उठाये ईंटों का बोझ 
मैं खोज रहा ,मेरा बचपन । 
स्कूल के दरवाजे से लौट आया 
खेल के मैदान भूल आया 
त्याग आया खिलौनों की दुनिया 
छोड़ आया गाँव की गलियाँ 
दोस्तों से अब हुई दूरियाँ 
शहरी मिट्टी पर ,ऊँची इमारतें बनाने 
सिर पर उठाये ईंटों का बोझ 
मैं खोज रहा ,मेरा बचपन । 
गन्नों के लहलहाते खेतों को छोड़ 
गाय  के ताजे दूध से मुंह मोड़ 
खेतों की सकड़ी पगडण्डी से 
शहरों  की चौड़ी सड़कों  पर
गांव के जीर्ण खटालों से 
भीड़ भरी शहरी चालों में 
सिर पर उठाये ईंटों का बोझ 
मैं खोज रहा ,मेरा बचपन । 

कल देखता था सपने ,
बचपन की अठखेलियों के 
आज कल्पित है सपने ,
भविष्य की कामयाबी के 
कल साँस लेता था खुली हवा में 
आज पसीना बहा रहा हूँ ,बंद मकानों में 
सिर पर उठाये ईंटों का बोझ 
मैं खोज रहा ,मेरा बचपन । 
picture from google.com  

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

its a sad state...beautifully penned!

mere vichar ek khuli kitab ने कहा…

Thanks Shweta-:)