मंगलवार, 28 जून 2016

गीत सुरीला


Displaying .facebook_1467118427670.jpg












रोज की तरह 
बैठी थी आज भी 
अपनी दफ्तर की कुर्सी पर 
कुछ फाइल देख रही थी 
कि  मीठा -सा  गीत 
कानों  को सुरीला लगा 
धीरे -से पलकें उठी 
होठों पर मुस्कराहट 
घौंसले में फिर -से दिखे  
चिड़िया के बच्चे चार 
गीत सुरीला चूं -चूं का था 
एकबार फिर मन मोहित हुआ 
जिस तरह पिछली साल ॥ 

This is posted under the Indi spire topic `With all your senses "Fall in love- One more time."

गुरुवार, 23 जून 2016

सांवली #thatstory


जब बन दुल्हन पिया संग
ससुराल अपने चली आई
साल -दो -साल में बिटिया प्यारी
मेरे  आँगन है मुस्कराई
उसकी तुतली बातों में
पिया की मस्त भरी बाहों में
दो साल फिर गुजर गए
गोदी में फिर से जुड़वां ने
धीमी मुस्कराहट से दस्तक दी
तीनो बेटियों संग रचा यह संसार
उनकी अठखेलियां ,बन गयी
जीवन की पर्याय ।

बड़े -बुजुर्गों से दबाब आने लगा
बेटियों को एक भाई तो चाहिए
मन ही मन कसोस रही थी
न है शक्ति मुझमें ,न क्षमता
सुझाव आया एक बेटा गोद ले लूँ
समझ ना पा  रही थी ,क्या दे
सकुंगी - प्यार किसी पराई जान को
जो अपनी कोख को दे रही हूँ
फिर भी स्वयं को समझाया ,
बहलाया ,की बेटा  तो चाहिए
वंशबृद्धि को ,या बहनो को भाई
इस उथल -पुथल में ले आई
अपनी गोदी में एक अनाथ फूल
परिवार की खुशियां सातवां
आसमान छू रही थी ,बेटियां पा
भाई ख़ुशी से मचल रही थी ।

आई फिर वह अपशकुन घड़ी
इस प्यार को डस  गयी एक भूल
खेलते -खेलते सीढ़ियों से यूँ गिरा
आँखे बूझ गयी चिरकाल  को
खुशियां प्यार सब लूट गया
पश्चाताप की गहन अग्नि में
बेवजह बेटे का क्यों मोह लगाया
ना चाह कर भी गले से लगाया
जीवन का अभिन्न अंग बनाया 
अपनी जान से भी ज्यादा चाहा
क्या यह एक अकाल्पनिक पश्चाताप नहीं ?


This is posted under the Indi spire topic"Loving is not always an easy task. Love comes with it's share of pain and guilt. Share a story or invent one where that pain is revealed in a form unimaginable, in a direction not-thought."






शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

मैं भी एक ब्लॉगर हूँ




Blogs लिखने की कहानी याद करूँ तो ,मैं बचपन में एक मेधावी छात्रा थी ।अपनी स्कूल की पत्रिका में लेख कविता लिखने की आदत थी । विवाहोपरांत भी मेरे पति करीब डेढ़ साल दिल्ली रहे , जंहा किसी कंपनी में कॉमर्सियल मैनेजर के पोस्ट पर थे । हमारा संपर्क ,मेल -मिलाप पत्रों के जरिये ही हुआ करता था । परिवार में मैं "पोस्ट -ऑफिस " के नाम से जानी  जाती थी । 

धीरे -धीरे संयोग कुछ ऐसा हुआ कि हमलोगों ने एक बोर्डिङ्ग स्कूल की शुरुआत की । मेरी बेटियां बड़ी हो रही थीं । मैंने स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया । मुझे पढाते अब छब्बीस वर्ष हो गए । बेटियां अपने ससुराल चली गईं । स्कूल के पश्चात  शाम का समय  बड़ा खाली  व  सुना लगता था । 

पचपन साल की होते -होते मुझे यूँ  लगने लगा कि स्वयं को व्यस्त रखने के लिए कुछ न कुछ hobby जरूर पाल लेनी चाहिए । इसप्रकार मैंने अपने सोये हुनर को एक बार फिर से जगाने की कोशिश शुरू की । बड़ी खुशी मिलती है जब अपने विचार इन ब्लॉग्स   के माध्यम से आप सभी के साथ बाँट पाती  हूँ , आप सभी के विचारों से खूब सीखने को भी मिलता है । सच कहूं  तो इंटरनेट, ब्लोग्स साइट ,तथा ब्लोग्स कैसे लिखे जातें हैं ,मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं था । 

मगर एक दृढ निश्चय के साथ लिखना शुरू किया है ।  आप सभी का प्यार मिलता है ,उत्साहजनक comments जब मिलते है तो लिखने का होंसला और बढ़ता है । ये ब्लॉग्स सही माने में मेरे बुढ़ापे के लिए बहुत बड़ा सकारात्मक सहारा   साबित होंगें । 

Thanks Indiblogger for giving me such a beautiful plateform to share my views.

This blog is written only for Indispire topic #IAmBlogger